कर्नाटक

मैसूर दशहरा की भव्य जंबू सवारी शुरू, 750 किलो सोने की अंबारी में विराजीं मां चामुंडेश्वरी

Kavita2
21 Oct 2026 5:45 PM IST
मैसूर दशहरा की भव्य जंबू सवारी शुरू, 750 किलो सोने की अंबारी में विराजीं मां चामुंडेश्वरी
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मैसूर। कर्नाटक के विश्व प्रसिद्ध नादाहब्बा मैसूर दशहरा महोत्सव के अंतिम चरण में बुधवार शाम ऐतिहासिक जंबू सवारी की शुरुआत हुई। मैसूर पैलेस परिसर में आयोजित भव्य समारोह में देवी चामुंडेश्वरी की प्रतिमा को 750 किलोग्राम वजनी स्वर्ण अंबारी में विराजमान किया गया। डी.के. शिवकुमार और मैसूर के शाही परिवार के सदस्य यदुवीर वोडेयार ने देवी को पुष्प अर्पित कर पारंपरिक जुलूस के शुभारंभ में भाग लिया। दशहरा महोत्सव के इस प्रमुख आयोजन में धार्मिक आस्था, राजसी परंपराओं और कर्नाटक की सांस्कृतिक विरासत का अनूठा संगम देखने को मिला।

शाम चार बजे शुरू हुई ऐतिहासिक जंबू सवारी

मैसूर दशहरा महोत्सव की सबसे प्रमुख परंपराओं में शामिल जंबू सवारी बुधवार शाम करीब चार बजे शुरू हुई।

मैसूर पैलेस के प्रांगण में आयोजित इस कार्यक्रम में देवी चामुंडेश्वरी की विशेष पूजा-अर्चना की गई।

इसके बाद स्वर्ण अंबारी में विराजमान देवी की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित किए गए।

जंबू सवारी मैसूर दशहरा का सबसे बड़ा आकर्षण मानी जाती है। इस ऐतिहासिक आयोजन में धार्मिक अनुष्ठानों के साथ कर्नाटक की समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं की झलक दिखाई देती है।

750 किलो वजनी स्वर्ण अंबारी बनी आकर्षण

जंबू सवारी के दौरान देवी चामुंडेश्वरी की प्रतिमा को पारंपरिक स्वर्ण अंबारी में स्थापित किया गया।

इस अंबारी का वजन लगभग 750 किलोग्राम बताया जाता है। इसे आम तौर पर सोने की अंबारी कहा जाता है, हालांकि यह पूरी तरह ठोस सोने से निर्मित नहीं है।

अंबारी को विशेष रूप से सजाए गए हाथी की पीठ पर रखकर पारंपरिक जुलूस निकाला जाता है।

इसकी भव्य बनावट और ऐतिहासिक महत्व के कारण यह मैसूर दशहरा का प्रमुख आकर्षण बनी रहती है।

डी.के. शिवकुमार और यदुवीर वोडेयार ने चढ़ाए पुष्प

समारोह में डी.के. शिवकुमार और शाही परिवार के सदस्य यदुवीर वोडेयार ने देवी चामुंडेश्वरी को पुष्प अर्पित किए।

डी.के. शिवकुमार कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री हैं, जबकि यदुवीर कृष्णदत्त चामराज वोडेयार मैसूर के पूर्व राजपरिवार के सदस्य हैं।

मैसूर दशहरा की परंपराओं में राजपरिवार की ऐतिहासिक भूमिका रही है।

इस आयोजन में शाही परंपरा और आधुनिक प्रशासनिक व्यवस्था का संगम देखने को मिलता है।

देवी चामुंडेश्वरी की आराधना के साथ जंबू सवारी का शुभारंभ मैसूर की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

कई प्रमुख हस्तियों की मौजूदगी

उपलब्ध विवरण के अनुसार, समारोह में मंत्री शिवराज थंगदगी, तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी और जिला प्रशासन के अधिकारी भी शामिल हुए।

हालांकि, अतिथियों की पूरी सूची की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है। दिए गए विवरण में केरल के मुख्यमंत्री के रूप में सतीशन का उल्लेख है, जबकि वी.डी. सतीशन केरल विधानसभा में विपक्ष के नेता हैं।

इसलिए उनकी उपस्थिति और पदनाम के संबंध में आधिकारिक जानकारी आवश्यक है।

मां चामुंडेश्वरी से जुड़ी है दशहरे की परंपरा

मैसूर दशहरा का धार्मिक महत्व देवी चामुंडेश्वरी की आराधना से जुड़ा हुआ है।

मान्यता के अनुसार, देवी चामुंडेश्वरी ने महिषासुर का वध किया था। इसी कारण विजयादशमी को बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है।

मैसूर में देवी चामुंडेश्वरी को विशेष स्थान प्राप्त है।

दशहरा महोत्सव के दौरान देवी की पूजा और जंबू सवारी की परंपरा स्थानीय लोगों की आस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा होती है।

शाही इतिहास से जुड़ा है मैसूर दशहरा

मैसूर दशहरा की परंपरा कई शताब्दियों पुरानी है।

वोडेयार राजवंश के शासनकाल में इस उत्सव को विशेष राजकीय स्वरूप मिला।

समय के साथ यह आयोजन कर्नाटक के सबसे बड़े सांस्कृतिक उत्सवों में शामिल हो गया।

मैसूर पैलेस की भव्य सजावट, पारंपरिक संगीत, लोककलाओं की प्रस्तुतियां और हाथियों का जुलूस इसकी विशेष पहचान हैं।

इस आयोजन के माध्यम से कर्नाटक की ऐतिहासिक विरासत और सांस्कृतिक विविधता को प्रदर्शित किया जाता है।

जंबू सवारी में हाथियों की महत्वपूर्ण भूमिका

जंबू सवारी की प्रमुख विशेषता सजे-धजे हाथियों का पारंपरिक जुलूस है।

स्वर्ण अंबारी को विशेष रूप से प्रशिक्षित हाथी की पीठ पर रखा जाता है।

इस वर्ष के आयोजन से जुड़ी जानकारी के अनुसार, प्रशांत नामक हाथी को अंबारी ले जाने की जिम्मेदारी दी गई।

हाथियों की भागीदारी मैसूर दशहरा की ऐतिहासिक पहचान का हिस्सा रही है।

इस दौरान पशुओं की सुरक्षा और स्वास्थ्य की निगरानी भी महत्वपूर्ण होती है।

मैसूर पैलेस में दिखी सांस्कृतिक भव्यता

मैसूर पैलेस दशहरा महोत्सव का प्रमुख केंद्र है।

उत्सव के दौरान महल की सजावट और पारंपरिक आयोजनों से शहर का वातावरण विशेष हो जाता है।

जंबू सवारी के अवसर पर महल परिसर में धार्मिक अनुष्ठानों के साथ सांस्कृतिक परंपराओं का निर्वहन किया गया।

यह आयोजन स्थानीय संस्कृति को देश-विदेश के लोगों तक पहुंचाने का अवसर भी प्रदान करता है।

कर्नाटक की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक

नादाहब्बा का अर्थ राज्य के प्रमुख उत्सव से जुड़ा है। मैसूर दशहरा को कर्नाटक की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है।

इस उत्सव में धार्मिक परंपराओं के साथ लोककला, संगीत, नृत्य और ऐतिहासिक विरासत को विशेष महत्व दिया जाता है।

जंबू सवारी इस महोत्सव का अंतिम और सबसे आकर्षक चरण है।

बुधवार शाम मैसूर पैलेस में देवी चामुंडेश्वरी की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित करने के साथ ऐतिहासिक जंबू सवारी का शुभारंभ हुआ। लगभग 750 किलोग्राम वजनी स्वर्ण अंबारी, पारंपरिक हाथियों का जुलूस और शाही विरासत से जुड़ी रस्में इस आयोजन के प्रमुख आकर्षण रहीं।

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